Header Ads

रईस की कामयाबी के 5 कारण

कुछ तथाकथित राष्ट्रवादियों ने अपनी दुकान चलाने के लिए दर्शकों के दिमाग में अपना फितूर डालने की कोशिश की. लेकिन वे ये भूल गए कि पैसे खर्च कर सिनेमा देखने वालों का अपना दिमाग होता है.


“अगर कटने का डर होता न, तो पतंग नहीं चढ़ाता, फिरकी पकड़ता...” शाहरुख खान ने रईस के अपने इस डायलॉग को बॉक्स ऑफिस पर सिद्ध कर डाला है. उन्होंने दिखा दिया कि बादशाह भाई का दिमाग और मियां भाई की डेरिंग का कोई जवाब नहीं क्योंकि असहिष्णुता और पाकिस्तानी कलाकारों को लेकर उनके खिलाफ जिस तरह का मोर्चा खोला गया था उससे निबटना कोई आसान काम नहीं थी.

आमिर खान और शाहरुख खान ने जब असहिष्णुता को लेकर मुंह खोला था तो राष्ट्रवादियों को यह नाकाबिले बर्दाश्त गुजरा और उन्होंने ठान ली कि अब इन सितारों की फिल्मों को चलने नहीं दिया जाएगा. बीजेपी नेता कैलाश विजयवर्गीय ने तो इन कलाकारों की फिल्मों का बायकॉट करने का आह्वान कर दिया था और कहा था कि आमिर खान की दंगल को जंगल बना देंगे जबकि उन्होंने रईस और काबिल की टक्कर में सबसे कहा कि वे शाहरुख खान की फिल्म न देखकर ऋतिक रोशन की काबिल देखें और देशभक्ति का परिचय दें.
शायद उनकी ये बातें सिनेमा देखने वाले देशप्रेमियों के कानों तक नहीं पहुंची. दंगल ने तो कमाई के नए कीर्तिमान स्थापित किए जबकि शाहरुख की रईस ने काबिल के मुकाबले दोगुनी कमाई की. काबिल ने 10.42 करोड़ रु. कमाए तो रईस ने 20.43 करोड़ रु. की छलांग लगाई. दूसरे दिन रईस के 27 करोड़ रु. और काबिल के लगभग 17 करोड़ रु. कमाने की बात कही जा रही है.
आइए जानते है रईस के चलने की पांच वजहें-
दर्शकों को आप डिक्टेट नहीं कर सकते
जैसा कुछ तथाकथित राष्ट्रवादियों ने करने की कोशिश की. उन्होंने अपनी दुकान चलाने के लिए दर्शकों के दिमाग में अपना फितूर डालने की कोशिश की. लेकिन वे ये भूल गए कि पैसे खर्च कर सिनेमा देखने वालों का अपना दिमाग होता है, और वह हर अच्छी चीज को देखना चाहते हैं और वे खुद तय करते हैं कि उन्हें क्या देखना है और क्या नहीं. उन्होंने इस बार भी ऐसा ही किया.
मजहब और राजनीति से परे है कला
कला को जब भी राजनीति और मजहब से जोड़ा गया, इस तरह के काम करने वालों को मुंह की खानी पड़ी है. कहते हैं न काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती. बीजेपी नेता ने बहुत कोशिश की वे आमिर और शाहरुख को डेंट कर सकें लेकिन कला प्रेमियों ने उनके मंसूबों पर पानी फेर दिया. उन्होंने शाहरुख और ऋतिक के बीच मुकाबले को मजहबी रंग देने की नाकाम कोशिश भी कर डाली, नतीजा सिफर निकला.
मियां भाई की डेरिंग और दिमाग
शाहरुख जानते थे कि उनकी फिल्म और उसमें पाकिस्तानी अदाकारा माहिरा खान का होना कई लोगों की पेशानी पर बल डाल सकता है. उन्होंने “जो धंधे के लिए सही, वो सही, जो धंधे के लिए गलत, वो गलत” पर अमल करते हुए, फिल्म से पहले ही एमएनएस प्रमुख से मुलाकात कर मामले को शांत करने की कोशिश की, और दिखा दिया कि वे एक बेहतरीन कलाकार के साथ बेहतरीन बिजनेसमैन भी हैं. सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर भी रईस को लेकर कई अभियान चले, लेकिन शाहरुख ने कोई परवाह नहीं की.
शाहरुख के आगे कहीं नहीं ठहरते ऋतिक
वैसे भी ऋतिक रोशन शाहरुख के आगे कहीं नहीं ठहरते हैं. शाहरुख को बॉलीवुड का बादशाह कहा जाता है, और उन्होंने अपने काम और दम पर बॉलीवुड में मुकाम हासिल किया है जबकि ऋतिक का पूरा करियर ही अपने पिता की फिल्मों पर सवार रहा है. उन्होंने अपने करियर में 10 हिट फिल्में दी हैं जिसमें से चार फिल्में तो उनके अपने पिता की ही हैं. जबकि शाहरुख की हिट फिल्मों का ग्राफ बहुत लंबा है. फिर शाहरुख का एटीट्यूड और फैन फॉलोइंग के आगे भी हृतिक कहीं नहीं ठहरते हैं.

रईस बनाम काबिल
अगर फिल्म की कहानी और ट्रीटमेंट को देखा जाए तो काबिल और रईस में रईस ही दो कदम आगे नजर आती है. कहानी के मामले में दोनों ही फिल्में कुछ हटकर नहीं हैं लेकिन शाहरुख और नवाजुद्दीन की कैमिस्ट्री, वनलाइनर और गर्मागर्मी रईस को खास बना देती है वहीं काबिल फिल्म में इस तरह की गर्म कैमिस्ट्री कहीं नजर नहीं आती है. संजय गुप्ता की प्रेरणा जहां एक विदेशी फिल्म रही वहीं रईस की प्रेरणा अमिताभ बच्चन स्टाइल फिल्म रही है.
इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

कोई टिप्पणी नहीं

Blogger द्वारा संचालित.